किसी कवि की कविताएं पढ़ना कवि मन की गहराइयों से गुजरना है। कविताएँ, कवि मन की परतें खोलती चलती हैं। कविताएं जब अजय रोहिल्ला की हो तो कविता गूढ़ होने के साथ सोचने को मजबूर करती है कि शब्दों की आकृति अपने पूरे ओज के साथ साफ और स्पष्ट होते हुए क्या कह रही है। पढ़े जाने की कौतूहल व जिज्ञासा अपने चरम को रचती तो है ही, जिसे आंशिक पढ़ना रिक्तता का बोध लगता है।
अजय रोहिल्ला की कविताएं ध्यान की उपस्थिति की अनिवार्यता को हर बार सँजोती हैं। आधार प्रकाशन पंचकूला हरियाणा से इसी साल 2025 में आई “अमूर्त काल” अजय रोहिल्ला की पहली कविता संग्रह है। समकालीन मुद्दों पर अपनी आवाज बुलंद करती यह 176 पृष्ठों में समाया 85 कविताओं का संग्रह है जिसे कवि ने अपने आदरणीय बाऊजी (पिता) को समर्पित किया है। अजय रोहिल्ला अभिनेता एवं फिल्म निर्देशक तो हैं ही, इस कविता संग्रह के प्रकाशन के बाद वें एक कवि के रूप में भी उभरते नज़र आ रहे हैं। बावजूद इसके कि वे कहते हैं “मैं खुद को कवि नहीं मानता” खैर, ये कवि मन की बात है लेकिन उनका उत्साह और लगन उन्हें निरंतर कविता लेखन के प्रति प्रवृत्त करता दिखाई दे रहा है।
“अमूर्त काल” की भूमिका के स्थान पर पुस्तक में पाठक कवि का ‘अंतरंग परिचय’ पाते हैं। जिसे संगीत नाट्य अकादमी पुरस्कृत, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व प्राध्यापक, प्रख्यात अभिनेता, रंगकर्मी, एवं चित्रकार आदरणीय रॉबिन दास ने लिखा हैं। अजय रोहिल्ला को ठोस विद्रोही कहते रॉबिन दासजी एनएसडी के अपने अनुभव में, अजय के अशांत खोजी बहुआयामी स्वाभाविक व्यक्तित्व की रूपरेखा को स्पष्ट करते हैं। चित्रकार, आर्ट डायरेक्शन, कॉस्टयूम डिजाइनर, अभिनय, निर्देशक के अलावा बलन्ट पॉलिटिकल कमेंटेटर के रूप में आँका जाना अजय रोहिल्ला की उपलब्धि है जो उन्हें मर्यादित नहीं बल्कि मुखरित करती है।
जब पाठक उनकी कविताओं से गुजरते हैं, उनकी कविताएं सघन शाब्दिक कोलाज सी सामने आती चौंकाती हैं। पुस्तक के अंतिम कवर पृष्ठ में वरिष्ठ कवि उदय प्रकाश जी की टिप्पणी है जिसमें वें कविताओं के साथ ‘धूमिल’ को याद करते हैं। यह बात अजय की कविताओं को एक उत्कर्ष देती है। उदय प्रकाश जी समय और यथार्थ के उद्दाम सघनता के साथ कविता के उद्गम को महसूस करते हैं यही वह विशेषता है जो कविताओं को पढ़ने ही नहीं उसके अर्थों तक पहुँचने के लिए जोर देती है।
अमूर्त काल की कविताएं समकालीन मुद्दों पर अपनी आवाज बुलंद करती हैं। कवि समाज की विषमताओं, समस्याओं पर अपनी बात रखते हैं। उनकी कविताएं समाज में घटित पर अपने विरोध का स्वर अंकित करती है। कविताएं जैसे मंच पर नाटकीय दृश्य प्रस्तुत करती अपनी खनक के साथ असमंजस की भूमिका में यथार्थ की चुप्पी को नरमाई से काटने की कोशिश करती हैं। ‘संसद से सड़क तक’ की याद दिलाती कविता की पंक्ति देखिए, “संसद की गूँगी दीवारों में/ गूँजती हैं बातें/ जो लौट आती हैं/ चूल्हे की बुझी राख में/ बैठी माँ की हथेलियों तक।” कवि सामाजिक व्यवस्थाओं पर ही नहीं नेता की जुबान पर भी कटाक्ष करते हैं। निडरता और हिम्मत के साथ सत्य का आगाज कविताओं का सौन्दर्य है जिससे पाठक बँधता पुस्तक के अंत तक के सुंदर लक्ष्य तक पहुँचता है।
कवि समाज में मेहनतकश की बेकदरी पर ही नहीं ग्रंथों में अंकित शूद्र पर विरोध प्रकट करते है। सत्ताओं की साजिशों में शहरों और गाँव की परेशानियाँ कवि की निगाह से नहीं छिपती। वें कहते हैं, “कहीं, किसी कोने में/ जहाँ हवाएं लाती हैं खबरें-/खेतों की सिसकियाँ/ शहरों का शोर/ और सत्ताओं की साजिशें”। कवि पसीने की खुशबू से दुनिया के धड़कनों को उकेरना चाहते हैं। वें बुनते इतिहास पर उँगली रखते, गवाह बनने से डरते समय का अक्स अपनी कविताओं में सशब्द रचते हैं। डर से डर का ऐसा दर्पण जो टूट रहा है। कविताएं निडर हो विश्वास सँजोती कवि के वैचारिक स्तर को प्रस्तुत करती है।

तनाव, त्रासदी और युद्ध परोसते समय में कवि बुद्ध की मुस्कान को याद करते ही नहीं बल्कि संदेश देते हैं, “युद्ध चीखता है/ ‘मैं शांति द्वार हूँ’/ पर बुद्ध की मुस्कान/ एक बादल-सा रँग/ जो कोलाहल के बारूद को भी पी जाता है”। कवि विद्रोह सँजोती कविताओं के साथ शांति की खोज को भी अहम समझते हैं। चारों ओर युद्ध के माहौल में कवि दुख के रँग पर अहिंसा का फाहा रखना चाहते हैं क्योंकि हर ओर हर रूप में मर रहा इंसान ही है। बुद्धि के तमाम सार्थक बंधनों के बाद भी कवि प्रेम बचाना चाहते हैं जो जीवन के उलझनों को सुलझाता उन्हें गुलाबी रंग देता है, “प्रेम/ रँगों का झरना/ बिना किनारे, बिना बंधन/ गाँठों को उँगलियों से सुलझाता”।
‘रंगमंच एक जीवंत स्वप्न’ कविता एक कवि की आपबीती का सुरूर है। कवि कलाकार के जीवन से रूबरू हैं, उनका यह अनुभव कविता में नए आयाम रचता है। कविताएँ मंच, किरदार, नए चेहरे और सितारों का जाल बुनती शख्सियत के भीतरी उथल पुथल को शब्द देती विभिन्न रँगों से सराबोर है। जिसमें दर्द, उलझन, उधेड़बुन, ठिठकन, दफन, खामोशी गलते मुखौटों से अपनी कहानी कहते नया जन्म पाते हैं। कवि तूफान के कोलाहल के बाद भी पसरे खालीपन को देखते हैं जिसमें मध्यम वर्ग के सपनों का रेंगना, जेब का खालीपन, सच की चिंगारी की तरह नज़र आता है और सपने ग्रे सायों में, अंधकारों में दब जाते हैं जबकि गलता यथार्थ सवाल लिए हमेशा मुँह बाएं खड़ा होता हैं।
समाज में पसरी मानवीय जीवन की वीभत्स वेदनाएं, तकलीफें कवि को झकझोरती है जहाँ छत भी साये की तरह नज़र आते हैं जो जाने कब सपने की तरह टूट जाए। कवि विचारों के बड़े से कैनवास पर मानव संघर्ष को उकेरने की पुरजोर कोशिश करते कविता रचते हैं। जिसमें तूफान बिखराव, भय, लपटें, सन्नाटा, कोहरा, संशय सभी कुछ है। जिसके साथ कवि का डर कहता हैं, “जो एक हों, वे तोड़ेंगे”, यह हालत से लड़ता मन के भीतर बैठा डर है। यह हर इंसान के सीने में दफन है।

कवि आम इंसान के जद्दोजहद को शब्द देते हैं। सर्व सामान्य के अंधेरे, रिसते जहर, चीखें, नंगी भक्ति, सच को कुचलती हकीकत, खतरे की चेतावनी से छटपटाती मानवता का रूप सभी को दिखाना चाहते हैं क्योंकि व्यवस्था ने आँखें और कान बंद कर रखे हैं। जिन्हें पिस रही जिंदगियों से कोई मतलब नहीं। जब राज करना ही हो मकसद, तो सामाजिक मूल्य और आदर्श भी खोखले लगने लगते हैं। कवि प्रतीकात्मक रूप में व्यक्ति के सपने, सुख, दुख को रँग, रेत, नदी, पंखुड़ियों के रूप में रखते हैं जो “पलक झपकते ही पत्थर बन ठहरती है”। इस तरह कवि समाज के कठोर हालात को बयान करते हैं।
कवि समाज में रुक हुए मानव संघर्षों के लिए चिंतित है जो लोभ के हाथों छीलती जाती है। राजनेताओं के ठहाकों के बीच सिक्कों की खनक और अंधेरे आँखों के होते सौदे कवि को बुरे लगते हैं। यह “स्वप्न है, दुःस्वप्न, या सच का नंगा यथार्थ?” कवि समाज की आँख में आँख डाल प्रश्न पूछने से नहीं झिझकते, जहाँ उत्तर भी खामोश है। कवि की कविता प्रकृति से बात करती है।

प्रकृति की छटाओं संग सुख-दुख की जुगाली चेतना को एक स्वर्णिम आकाश देती है। एक ओर कवि कविता के कैनवास पर मजदूर, मेहनतकश और किसानों के पसीने को संजोते हैं वहीं दूसरी ओर समाज की रूपरेखा पर राजनैतिक चालें उनका ध्यान खींचती है, “अमूर्त रेखाएं टकरातीं/ राजनैतिक खेल-शतरंज का जाल/ सामाजिक दाग-चेहरे पर नकली चाँदनी/ नए गुलामों की चमक/ कोड़ों की छाया में कांपती”। देश के वैश्विक स्तर का संज्ञान लेते हुए कवि इतिहास के जख्मों पर भी रोशनी डालते हैं। कविता, रक्तरंजित इतिहास की अधूरी सांसें व उसके होने का बयान है, “सूरज लाल, खून से सना/ मस्जिद की नींव में मंदिर दबा/ सत्ता की भूख चीखती है।/ सुनहरा रँग बौद्ध विहार का/ मंदिर की छाया में कुचला/ वोटों का झुनझुना बजाता है।” हर सच से पर्दा उठाते कवि नीला चाँद चाहते हैं। प्रेम को सर्वोपरि रखते कहते हैं “प्रेम वह—जो चाँदनी में बहे”। यह निरी कल्पना नहीं बल्कि समाज को खूबसूरत बनते देखने के सुंदर विचार है।
साहित्य का शिल्प उनकी रुचि का संसार नहीं। छंद को नकारते कवि लिखते हैं, “साहित्य/ तब होता है/ जब शब्द/ मेरे भीतर की चुप चीखों का अनुवाद बन जाएं।” कला अगर अँधेरों से परिचय नहीं कराती तो ऐसी कला को वें भ्रम मानते हैं। शहर, न सत्य न स्वप्न कवि कहते हैं जीवन जहाँ फटी दरारों में चमकता है। हेमलेट, कालिदास, अश्वत्थामा, ब्रूटस, मैकबेथ को जीता अभिनेता दर्शकों की साँसों में ही जीवन पाता है। लिखना उनके लिए आहत होना है। खुद से एक अंदरूनी लड़ाई लड़ते कवि फिर भी एक आशा का वितान रचते हैं, “शक्ति/ साजिशों को हराकर/ नया इतिहास रचेगी।”
समाज में चल रहे ढोंग, छल-प्रपंच के खिलाफ निर्भीक आवाज उठाते कवि पुरजोर विरोध करते है, जहाँ लोक के आगे तंत्र बड़ा हो चुका है। विध्वंस, विनाश हथियार बन चुके हैं। कवि निर्दोषों की आवाज बनते दब रहे आक्रोश, चीखों को शब्द देते। वहीं नेतृत्व द्वारा हो रही गुलामी की कोशिश को भी नकारते हैं। इक्कीसवीं सदी में भी चकित करते ‘जाति’, ‘शूद्र’ जैसे शब्द कविता का हिस्सा हैं। वहीं धर्म को गुलामी मानते कवि संविधान को कागज का सपना बताते दुखी होते हैं। फासीवाद से आँखें मिलाते विद्रोह के लिए तत्पर, दागते हैं, “हाँ/ मैं सवाल हूँ।” बावजूद इसके इस असंभव से समय में कवि संदेश देना नहीं भूलते, “सब हैं कहीं ना कहीं/ कुछ अधूरे/ मिलकर ही सब हो सकते हैं पूरे/ अगर हो पाए तो”। संज्ञान लेती कविताएं बहुत कुछ कहने की सफल कोशिश है।
‘अमूर्त काल’ की कविताएं कवि अजय रोहिल्ला का अपना शिल्प है जो अन्य कवियों से उन्हें अलग करता है। यह वैचारिक उद्वेग की कविताएं है जो रिस-रिस कर रोष, भेद, अवसाद पेश करती है। भाव, संवेदनाएं, विचार, प्यार, आवेश जिसे कवि प्रतीकात्मक रूप में प्रस्तुत करते है। कविता की शैली और शब्दों का चुनाव कवि की भावनाओं में छिपी संवेदनाओं से परिचय कराने में सक्षम है। बुलंद स्वरों की कविताएं कवि की अपनी विशेषता है।
(समीक्षक रीता दास राम कवयित्री/ लेखिका हैं और मुंबई में रहती हैं।)
